नमस्कार जब मेवाड़ की रानी कर्णावती ने हिमायुँ को राखी भेज दी क्यों 13000 औरतें को जोहार करना पड़ा तो क्यों हमें पढाया जाता है की रानी कर्णावती की हिमायुँ ने सहायता की थी तो क्या है वो कल सच जो हमसे छुपाया गया ये कहानी है मेवाड़ के राजा राणा संग की पत्नी रानी कर्णावती जी, प्रेजेंट टाइम में राजसमंद भीलवाड़ा उदयपुर और चित्तौड़गढ़ इन चारों को अगर मिला दिया जाए तो वो पहले का मेवाड़ बन जाता है मेवाड़ के राजा राणा संग ने अपने जीवन में अनेक युद्ध लड़े और हर युद्ध था एक नई कहानी की शुरुआत, राणा संग की वीरता का परिचय आप इस बात से लगा सकते हो की राणा संग ने अपनी जिंदगी में 100 में से 99 युद्ध उन्होंने जीते हैं ये वो राणा संग ही था जिसे रणभूमि में देख दुश्मन थरथर कांपता था
जिसने दिल्ली संतमत को कई बार ललकार रहा था इस महान योद्धा के हाथ कट जान और शरीर पर 80 गांव होने के बाद भी ये हर युद्ध जितना ही जा रहा था ऐसे क्या स्थिति ए की इतने महान राजा महाराजा राणा संग की पत्नी महारानी कर्णावती मुगल साम्राज्य के राजा राजा हिमायुँ को राखी भेजनी पड़ी वो भी अपनी मदद के लिए तो मैं आपको थोड़ा सा पीछे लेक चला हूं बातें 17 मार्च 1527 ये कोई आम दिन नहीं था इस दिन कुछ ऐसा होने वाला था जो मेवाड़ के लिए अच्छा नहीं था इस दिन हुआ था एक भयानक युद्ध जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते क्या हुआ था इस दिन क्या राणा संग का वो अंतिम दिन था इस दिन छोटे से गांव खावा के पास एक ऐतिहासिक युद्ध जो की मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर और मेवाड़ के राजा राणा संग के बीच लाडा गया राणा संग के योद्धा मुगलो के सैनिकों को खदेड़ते ही जा रहे थे इस पलों में ऐसा एहसास हो रहा था मानो की राणा संग जीत ही गया
लेकिन नियति को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं था की राणा संग के युद्ध जीते वैसे तो राणा संग यह युद्ध कभी नहीं हार्ट लेकिन बाबर अपने साथ लेकर आया था जैसे ही राणा बताऊंगा की सी मुगलो को कुचलते हुए बाबर के नजदीक पहुंचने ही वाली थी की तपन से गोलों की वर्षा होने लगी देखते ही देखते इन तपन के गोलो ने राणा संग के योद्धाओं को मौत के घाट उतारने लगी देखते ही देखते युद्ध का पास पलटने लगा और राणा संग की सी कम होने लगी उसे कपाट की वजह से राणा संग को जिंदगी में पहले बार हर का सामना करना पड़ा इस युद्ध में राणा संग बुरी तरह से घायल हो गए लगभग 1 साल के बाद बाबर की कूद नीति के करण 30 जनवरी 1528 की राणा संग के सरदारों ने राणा संग को जहर देकर मार दिया इसके उपरांत राणा संग के पुत्र रतन सिंह को मेवाड़ की गाड़ी पर बिताया जाता है वहीं दूसरी और लंबी बीमारी के करण 26 दिसंबर 1530 को बाबर की मृत्यु हो जाति है इसके बाद बाबर के बेटे हिमा को राज गाड़ी पर बिताया जाता है इधर मेवाड़ की किस्मत में कुछ और ही लिखा था 1531 में राणा रतन सिंह धरपुर युद्ध में शाहिद बन जाते हैं
महारानी करुणावती के सबसे बड़े बेटे महाराज विक्रमादित्य को राज सिंहासन पर बिताया जाता है हालांकि राज सिंहासन पर बिठाने की विक्रमादित्य की इतनी उम्र नहीं थी उसे समय वह केवल 20 वर्ष के थे विक्रमादित्य इतने योग्य नहीं थे की वो राज सिंह को संभल पे वो अपने सरदारों का भी अपमान कर दिया करते थे और इससे सरदार नाराज हो के कहानी और चले गए इसकी वजह से मेवाड़ का दबदबा कम होता जा रहा था और इसी का फायदा उठाने के लिए गुजरात के राजा बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण करने की सोच इधर विक्रमादित्य को साल भर भी नहीं हुआ था गाड़ी पर बैठने हुए और वहीं दूसरी और गुजरात के शासन बहादुर शाह ने 1532 की मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया अगली सुबह विक्रमादित्य ने बादशाह बहादुर शाह को संदेश भेजना का प्रयास किया लेकिन वह सफल रहा वहीं दूसरी और बहादुर शाह ने असंख्य सी के साथ केले को चारों तरफ से घर कर तपन की वर्षा करनी शुरू कर दी इधर विक्रमादित्य के पास एक छोटी सी सी के टुकड़ी थी जिसने बहुत से सालों से प्रयास भी नहीं किया था
इस स्थिति को देखते हुए राजमाता ने फिर से एक संधि करने की सोची और इस बार राजमाता ने संधि के लिए अपने एक दूध को भेजो और इस बार बहादुर शाह वह संदीप मां भी गया था लेकिन बहादुर शाह कहां माने वाला था उसने सन 1535 के अंदर एक बार फिर से चित्तौड़ की तरफ आक्रमण कर दिया राजमाता ने स्थिति को देखते हुए सियासत अपने हाथ में ले ली इधर राजमाता को पता था की हमारे सी बहुत ही छोटी है और हमारे सरदार भी हमसे रूठे हुए हैं इसी के करण राजमाता ने फैसला लिया की वे मुगल बादशाह हुमायूं को अपनी मदद के लिए राखी भेजेंगे ऐसा क्या करण था की रानी कर्णावती ने हिमा को राखी भेजी राजमाता ने अपनी सूझबूझ से बहादुर शाह के दुश्मन हुमायूं को मदद के लिए राखी भेजी इनकी दुश्मनी की वजह थी एक तो यह पड़ोसी मूल थे और हुमायूं का एक सरदार बहादुर शाह के साथ मिलकर हिमा की गाड़ी को फड़कने की कोशिश कर रहा था इस बात को मद्देनजर हुए महारानी कर्णावती ने पदमा नमकसा के हाथों से राखी भेजी थी इसका वर्णन भी आपको बहुत साड़ी किताबें के अंदर मिल जाएगा जैसे की डी कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया हिस्ट्री ऑफ गुजरात एनल्स और एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान मेवाड़ और मुगल हुमायूं राखी देव तुरंत प्रभाव सी के साथ वहां से रावण हो गया
इधर मेवाड़ में एक-एक दिन निकालना मुश्किल हो जा रहा था और रानी कर्णावती ने अपनी सूझबूझ दिखाकर सभी सरदारों को एक पत्र लिखा और ये पत्र ये आपकी मंत्र भूमि है मैं आपको सौंपती हूं चाहे तो इसे रखो अन्यथा थल में सजाकर दुश्मन को सोप दो तुम्हारे सरदार राणा संग के रहते हैं किसी की भी हिम्मत नहीं हुई की मेवाड़ में कोई शत्रु कम रखें आज मेवाड़ के वो राणा तो नहीं है पर मैं खुद युद्ध के लिए कीड़े से बाहर निकलूंगी मां भवानी का सहारा तो विजय श्री के बाद तुम्हें मनाने जरूर आऊंगी जैसे ही सरदारों को ये पत्र मिला उनका खून खोलना लगा और सभी सरदार एग्जिट होकर उन्होंने विचार विमर्श करके अपनी भूमि को बचाने का निर्णय लिया वहीं दूसरी और हुमायूं ग्वालियर पहुंच चुका था लेकिन हुमायूं को पता चला की बहादुर शाह काफिरों के लिए कल बैंक टूटा है और दोनों का मकसद तो एक ही था इसी करण हुमैयों काफिरों का साथ नहीं देना चाहता था इसी करण वह ग्वालियर में रुक गया और युद्ध का इंतजार करने लगा क्योंकि फायदा इस का था चाहे कोई भी जीते या हरे वह चाहता तो उसे केटल आम को रॉक सकता था लेकिन नाच गाने जुलूस और आसाराम में 2 महीने निकाल दिए
ये सच्ची घटना है इसका वर्णन आपको बहुत सी किताबें में मिलेगा और कुछ किताबें हैं जिसके अंदर इसका वर्णन किया गया है जैसे की हुमायूं बादशाह अकबरनामा टकड़े अकबरी इधर बहन पास लगा के बैठी थी और उसे साइड भाई स्वरम की जिंदगी जी रहा था
लेकिन रानी कर्णावती जिसे भाई समझ रही थी की उसे भाई के लिए वो कभी बहन थी ही नहीं इसके लिए वह सिर्फ काफी थी हिमा को जरा भी दया नहीं की वहां पर उसकी बहन इतनी तकलीफ में है और इतनी साओ विनाश हो रहा है वहीं दूसरी और बहादुर शाह ने मेवाड़ के केले को पुरी तरह से घर लिया था और तपन से और तीरों से वर्षा करनी शुरू कर दी और बहादुर शाह का पालदा भारी होता जा रहा था बहुत ही जल उसने सी के दो मोर्चा को तहस-नहस कर दिया था इधर रानी कर्णावती को विश्वास हो चुका था की जी भाई को मैंने चुनाव है वह नहीं आने वाला है यही राखी अगर किसी हिंदू राजा को भेजी होती तो आज पूरे मेवाड़ की रक्षा हो जाति लेकिन अफसोस मेवाड़ के भाग्य में कुछ और ही लिखा था इधर महारानी कर्णावती को यह महसूस हो चुका था की अब हमारी हर निश्चित है इधर 17 नहीं होने थान ली की हम जान की कुर्बानी दे देंगे लेकिन हम अपने आप को मुगलो को कभी नहीं सो पाएंगे 8 मार्च 1535 राजपूत ने अपना अद्भुत जोहार दिखाने की थान ली के साथ केले का द्वारा खुलना है पुरी राजपूत सी माथे पर केसरिया पगड़ी बंदे निकली है आज सूर्य भी रुक कर उनका शौर्य देखना चाहता है आज हवाएं उन अतुल्य स्वाभिमानी योद्धाओं के चरण चुन चाहती है आज धारा अपने वीर पुत्रों को कलेजे से लिपटा लेना चाहती है आज इतिहास स्वयं पर गर्व करना चाहता है आज भारत के भारत होने पर गर्व करना चाहता है
इधर मृत्यु का आलिंगन करने निकले वीर राजपूत बहादुर शाह की सी पर विद्युत द्वितीय से तलवार बंद रहे हैं और उधर केले के अंदर महारानी कर्णावती के पीछे देवियां मुंह में गंगाजल और तुलसी पुत्र लिए अग्नि कुंड में सम रही है [संगीत] आज भारत अभी भी भारत केले के बाहर ग्राम रक्त की गंद फेल गई है और केले के अंदर अग्नि में समाहित होती शतरण्यों की देशों की पूरा वायुमंडल बस उठा है और घृणा से नाग सीखोड़कर खड़ी जैसे चिकर का रही है भारत की आने वाली पीडिया इस दिन को याद रखना और याद रखना इस गंद को जीवित जलती अपनी माता के देहात की गंद जब तक तुम्हें याद रहेगी तुम्हारी सभ्यता जीएगी दो घंटे तक चलें युद्ध में स्वयं से 4 गुना शत्रु को मार कर राजपूत ने वीरगति पाल और अंदर केले में असंख्य देवेन अपनी रख से भारत के मस्तक पर स्वाभिमान का तिलक लगा दिया कहते हैं
इस युद्ध में इतना रख पाठ हुआ की एक बरसाती नाले की तरह खून का नाला बहने लगा युद्ध इतना घमासान युद्ध था इस युद्ध के अंदर 13000 औरतें ने जोहार किया और 3000 बच्चों ने अपनी जान गाव दी जैसे ही हिमायुँ को पता चला की अब बहादुर शाह जीत चुका है तो उसने मेवाड़ को हड़पने की सोची बहादुर शाह पर आक्रमण कर मेवाड़ को जीत लिया थोड़े ही समय के अंतराल में एक फिर से घमासान युद्ध हुआ हिमायुँ और मेवाड़ के राजपूतो के बीच और मेवाड़ को फिर से राजपूतो ने जीत लिया लेकिन फिर भी हमें पटाया जाता है की हुमायूं ने रानी कर्णावती की सहायता की थी
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